मैं तुम्हें अल्लाह से डरने तथा (अपने शासनकर्ता की) बात सुनने और मानने की वसीयत करता हूँ, चाहे तुम्हारा शासक एक दास ही क्यों न हो। क्योंकि तुममें से जो जीवित रहेगा, वह बहुत सारा मतभेद और टकराव देखेगा। उस समय तुम मेरी सुन्नत और सत्य के मार्ग पर चलने वाले ख़लीफ़ागण की सुन्नत को सीने से लगाए रहना
हमने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से कठिनाई और आसानी में, चुस्ती और सुस्ती में और हमारे ऊपर तरजीह दिए जाने की अवस्था में भी सुनेंगे और अनुसरण करेंगे
तुमपर ऐसे शासक नियुक्त हो जाएँगे, जिनके कुछ काम तुम्हें अच्छे लगेंगे और कुछ बुरे। ऐसे में जो (उनके बुरे कामों को) बुरा जानेंगे, वह बरी हो जाएँगे और जो खंडन करेंगे, वह सुरक्षित रहेंगे। परन्तु जो उनको ठीक जानेंगे और शासकों की हाँ में हाँ मिलाएँगे (वह विनाश के शिकार होंगे)।
ऐ अल्लाह! जो व्यक्ति मेरी उम्मत की कोई ज़िम्मेवारी हाथ में ले, फिर वह उन्हें कठिनाई में डाले, तो तू उसे कठिनाई में डाल। और जो मेरी उम्मत की कोई ज़िम्मेवारी हाथ में ले, फिर उनके साथ नर्मी का मामला करे, तो तू उसके साथ नर्मी का मामला कर।
जिस बंदे को अल्लाह जनता की रखवाली का काम सोंपे और वह जिस दिन मरे तो उन्हें धोखा देते हुए मर जाए, तो उसपर अल्लाह जन्नत हराम कर देता है।
“जो मुसलिम शासक के आज्ञापालन से इनकार करे और (मुसलमानों की) जमात से निकल जाए, फिर उसकी मृत्यु हो जाए तो ऐसी मृत्यु जाहिलियत वाली मृत्यु है
“जो तुम्हारे पास इस हाल में आए कि तुम लोग किसी को ख़लीफ़ा मानकर उसका अनुसरण कर रहे हो तथा वह तुम्हारी एकता को भंग करना चाहे या तुम्हारी जमात में बिखराव पैदा करना चाहे, तो ऐसे व्यक्ति को कत्ल कर दो।”
तुम अल्लाह से डरते रहना और अपने शासकों के आदेश सुनना तथा मानना। चाहे शासक एक हबशी ग़ुलाम ही क्यों न हो। तुम मेरे बाद बहुत ज़्यादा मतभेद देखोगे। अतः तुम मेरी सुन्नत तथा नेक और सत्य के मार्ग पर चलने वाले ख़लीफ़ागण की सुन्नत पर चलते रहना।
एक अल्लाह की इबादत करो, किसी चीज़ को उसका साझी न बनाओ तथा उन बातों को छोड़ दो जो तुम्हारे बाप-दादा कहते हैं। तथा हमें नमाज़ एवं सत्य का आदेश देते हैं।
आने वाले समय में वरीयता दिए जाने के मामले और ऐसी बातें सामने आएँगी, जो तुम्हें बुरी लगेंगी।" सहाबा ने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल! तो आप हमें क्या आदेश देते हैं? फ़रमाया : "तुम अपनी ज़िम्मेवारियाँ अदा करते रहना और अपना हक़ अल्लाह से माँगना।
वे तुम्हें नमाज़ पढ़ाएँगे; अब यदि सही-सही पढ़ाएँगे तो तुम्हारे लिए होगी और यदि ग़लती करेंगे तो तुम्हारे लिए सही और उनके विरुद्ध होगी।
ऐ अल्लाह! जो व्यक्ति मेरी उम्मत के किसी मामले का ज़िम्मवार बने और उन्हें कठिनाई में डाले, तू भी उसे कठिनाई में डाल तथा जो व्यक्ति मेरी उम्मत के किसी मामले का ज़िम्मेदार बने और उनके साथ नर्मी करे, तू भी उसके साथ नर्मी कर।
सब्र से काम लो। क्योंकि हर बाद में आने वाला समय पहले वाले के मुक़ाबले में बुरा होगा, यहाँ तक कि तुम अपने रब से जा मिलो।
सुनो और अनुसरण करो। उनपर उस बात की ज़िम्मेवारी है, जो उनके ऊपर डाली गई है और तुमपर उस बात की ज़िम्मेवारी है, जो तुमपर डाली गई है।
तथा जो किसी इमाम की बैअत करे और उसे अपना हाथ तथा अपने दिल का फल दे दे, उसे चाहिए कि जहाँ तक हो सके, उसका अनुसरण करे। फिर अगर कोई दूसरा उसे अपने मातहत करने के लिए उससे झगड़ा करे, तो उसकी गरदन उड़ा दो।
तुममें से जिसे मैं किसी प्रशासनिक काम की ज़िम्मेवारी दूँ, फिर उसने हमसे एक सूई या उससे भी छोटी चीज़ छिपाई, तो वह ख़यानत में शुमार होगा, जिसे लेकर वह क़यामत के दिन उपस्थित होगा।
तुम (अपने शासकों की बात) सुनो और अनुसरण करो, कठिन परिस्थिति में भी तथा आसान परिस्थिति में भी, चाहते हुए भी तथा न चाहते हुए भी एवं उस समय भी जब तुमपर किसी और को तरजीह दी जाए।
जब हम अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के हाथ पर सुनने तथा आज्ञा का पालन पर बैअत करते, तो आप हमसे फ़रमाते : "जहाँ तक हो सके, इसका पालन करना।।”
एक मुस्लिम व्यक्ति पर ज़रूरी है कि वह सुने और आज्ञा का पानल करे। चाहे उसे पसंद हो या नापसंद। यह और बात है कि उसे किसी गुनाह का आदेश दिया जाए। यदि उसे किसी गुनाह का आदेश दिया जाता है, तो सुनना और आज्ञा का पालन करना ज़रूरी नहीं है।
बात सुनो और अनुसरण करो, यद्यपि तुम्हारा शासक किसी हबशी दास ही को क्यों न बना दिया जाए, जिसका सर किशमिश की तरह हो।
जिसने मेरी आज्ञा का पानल किया, उसने अल्लाह की आज्ञा का पालन किया और जिसने मेरी अवज्ञा की, उसने अल्लाह की अवज्ञा की। जो अमीर की आज्ञा का पालन करता है, वह मेरी आज्ञा का पालन करता है और जो अमीर की अवज्ञा करता, वह मेरी अवज्ञा करता है।
तुम्हारे सबसे अच्छे शासक वह हैं, जिन्हें तुम पसंद करते हो और वे तुम्हें पसंद करते हैं। इसी तरह, वे तुम्हारे लिए दया की प्रार्थना करते हैं और तुम उनके लिए दया की प्रार्थना करते हो। जबकि तुम्हारे सबसे बुरे शासक वह हैं, जिन्हें तुम नापसंद करते हो और वे तुम्हें नापसंद करते हैं। इसी तरह, तुम उनपर लानत भेजते हो और वे तुमपर लानत भेजते हैं।
जल्द ही तुम लोग इमारत और सरदारी की लालच करोगे। जबकि क़यामत के दिन तुम्हें उसकी वजह से नदामत और शर्मिंदगी होगी। दूध पिलाने वाली अच्छी होती है और दूध छुड़ाने वाली बुरी।
अगर वो उस आग में घुस जाते तो क़यामत तक उससे निकल न पाते। अनुसरण केवल शरीअत सम्मत कार्यों में किया जाएगा।
ऐसे लोग तुम्हारे शासक बन जाएँगे, जो झूठ बोलेंगे और अत्याचार करेंगे। ऐसे में जो उनके झूठ की पुष्टि करेगा और अत्याचार में उनका सहयोग करेगा, उसका मुझसे कोई संबंध नहीं है और मेरा उससे कोई संबंध नहीं है।
ऐ अब्दुर्रहमान बिन समुरा! सत्ता न माँगो, क्योंकि यदि माँगने पर सत्ता दिए गए, तो तुम उसी के हवाले कर दिए जाओगे
जब अल्लाह तआला, शासक या अधिकारी के साथ भलाई का इरादा करता है, तो उसे सच्चा सहायक प्रदान करता है, जो भूलने पर याद दिलाता है और याद रहने पर सहायता करता है। परन्तु, जब इसके विपरीत इरादा करता है, तो उसे बुरा सहायक प्रदान करता है, जो न भूलने पर याद दिलाता है, न याद रहने पर सहायता करता है
अल्लाह ने जितने भी नबी भेजे और जितने भी शासक बनाए, सबके दो प्रकार के सलाहकार होते हैं; एक वह सलाहकार जो भलाई का आदेश देता है और उसकी प्रेरणा देता है। दूसरा वह सलाहकार जो बुराई का आदेश देता है और उसी का प्रोत्साहन देता है
ऐ अबूज़र, में तुमको कमज़ोर समझता हूँ, तथा तुम्हारे लिए भी वही बात पसंद करता हूँ, जो मैं अपने लिए पसंद करता हूँ; दो व्यक्तियों का भी अमीर न बनना और न किसी अनाथ के धन का वाली (संरक्षक) बनना।
ऐ अबूज़र, तुम एक दुर्बल व्यक्ति हो और यह पद एक अमानत है और यह क़यामत के दिन अपमान तथा शर्मिंदगी का सामान भी है। यह और बात है कि कोई उसे उसके हक़ के साथ प्राप्त करे और उसके बारे में उसके ऊपर जो ज़िम्मेवारियाँ आती हैं, उन्हें अदा करे।
मुझे याद आया कि हमारे पास सोने का एक टुकड़ा रखा हुआ है। अतः, मुझे यह अच्छा नहीं लगा कि मेरा ध्यान उसी में अटका रहे। सो, मैंने उसे बाँटने का आदेश दे दिया।
अल्लाह की क़सम! हम यह कार्य किसी ऐसे व्यक्ति को नहीं सौंपते, जो माँगकर लेना चाहे अथवा किसी ऐसे व्यक्ति को नहीं सौंपते, जो उसकी लालसा रखे।
ऐ बेटे! मैंने अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को कहते हुए सुना हैः सबसे बुरे शासक, जनसाधारण पर अत्याचार करने वाले हैं। अतः, तुम ऐसे लोगों में शामिल न होना।
कोई वस्तु माँगने में हद से ज्यादा आग्रह मत करो। क्योंकि तुममें से कोई व्यक्ति जब मुझसे कोई चीज़ माँगता है और मुझे पसंद न होेने के बावजूद उसका सवाल मुझेस कोई वस्तु निकाल लेता है, तो मेरी दी हुई चीज़ में बरकत नहीं दी जाती।
मैं अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के साथ जा रहा था और आपके शरीर पर एक मोटे किनारे वाली नजरानी चादर थी। इसी बीच, आपको एक देहाती मिला और बड़े ज़ोर से चादर पकड़कर खींचा।
नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने एक अज़्दी व्यक्ति, जिसे इब्न अल-लुतबिया कहा जाता था, को ज़कात का धन इकट्ठा करने का ज़िम्मेवार बनाया। जब वह वापस आया, तो बोला : यह आप लोगों का है और यह मुझे भेंट स्वरूप दिया गया है। यह देख अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) मिंबर पर खड़े हुए तथा अल्लाह की बड़ाई व प्रशंसा की
अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) यात्रा में सबसे पीछे चलते तथा कमज़ोर को हाँकते, उसे अपने पीछे सवार कर लेते और उसके लिए दुआ करते।
हम लोग जब अपने बादशाहों के पास जाते हैं, तो ऐसी बातें करते हैं, जो बातें वहाँ से निकलने के बाद नहीं करते। उन्होंने उत्तर दिया : हम इसे अल्लाह के रसूल- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के युग में निफ़ाक़ -पाखंड तथा ढ़ोंग- समझते थे।
जिसको सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह ने मुसलमानों के मामलों का ज़िम्मेवार बनाया तथा वह उनकी आवयश्यकता, ज़रूरत एवं निर्धनता के समय छुपा रहा, तो अल्लाह भी क़यामत के दिन उसकी आवयश्यकता, ज़रूरत और मोहताजी के समय सामने नहीं आएगा।
ऐ अमीरुल मोमेनीन, अल्लाह तआला ने अपने नबी- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से कहा हैः "خذ العفو وأمر بالعرف وأعرض عن الجاهلين" (अर्थात्, क्षमा करते रहें, भली बात का आदेश दें और अज्ञानियों से मुँह फेर लें।) और यह अज्ञानियों में हैं।
अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के ज़माने में कुछ लोगों की पकड़ वह्य (प्रकाशना) द्वारा हो जाती थी। परन्तु, अब वह्य का सिलसिला बंद हो चुका है। अब हम तुम्हारी पकड़ तुम्हारे उन कर्मों के आधार पर करेंगे, जो हमें नज़र आएँगे। अतः, जो हमें अच्छाई दिखाएगा, हम उसपर विश्वास करेंगे और अपने करीब करेंगे। उसके दिल में क्या है, हमें इससे कोई मतलब नहीं है। उसके दिल के अंदर छिपी बातों का हिसाब अल्लाह लेगा। तथा जो हमें बुराई दिखाएगा, हम उसपर विश्वास नहीं करेंगे और उसकी बातों की पुष्टि नहीं करेंगे।
कूफ़ा वालों ने उमर (रज़ियल्लाहु अन्हु) के यहाँ साद बिन अबू वक़्क़ास (रज़ियल्लाहु अन्हु) की शिकायत की, तो उमर (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने उनको हटाकर अम्मार बिन यासिर (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) को उनका हाकिम बना दिया।
उमर बिन ख़त्ताब (रज़ियल्लाहु अंहु) ने पहले हिजरत करने वाले मुहाजिरों के लिए पेंशन की राशि निर्धारित की।
सबसे अच्छे साथी चार हैं, सबसे अच्छा सैन्य-दल चार सौ का है और सबसे अच्छी सेना चार हज़ार की है और बारह हज़ार की सेना कम संख्या के कारण पराजित नहीं हो सकती।
जो स्वयं किसी कार्य को करने के लिए लालायित हो हम उसको अपने किसी कार्य के लिए उपयोग नहीं करते। परन्तु ऐ अबू मूसा, अथवा ऐ अब्दुल्लाह बिन क़ैस (यह अबू मूसा अशअरी का ही नाम है), तुम यमन चले जाओ।
निःसंदेह अल्लाह ने मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को सत्य के साथ भेजा है और आपके ऊपर (कुरआन नामक) किताब उतारी है। आपपर जो आयतें उतारी गईं हैं, उनमें संगसार (इस्लामी धर्मशास्त्र के अनुसार एक प्रकार का प्राणदंड जिसमें अपराधी को ज़मीन में कमर तक गाड़कर उसके सिर पर पत्थरों की वर्षा करके मार दिया जाता है) की आयत भी थी। हमने उसको पढ़ा है, याद किया है तथा समझा है। चुनांचे अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने संगसार किया है और हमने भी आपके बाद संगसार किया है।
निश्चय ही बहुत-से फ़ितने सामने आएँगे। सुन लो, फिर एक फ़ितना ऐसा सामने आएगा कि उसके प्रकट होने के बाद बैठा हुआ व्यक्ति उसमें चलने वाले से बेहतर होगा और चलने वाला व्यक्ति उसकी ओर दौड़ने वाले से बेहतर होगा।