“तहारत (पवित्रता) आधा ईमान है। ‘अल-हमदु लिल्लाह’ तराज़ू को भर देगा। ‘सुबहान अल्लाह’ और ‘अल-हमदु लिल्लाह’ आकाश और धरती के बीच के ख़ाली स्थानों को भर देंगे
जिसने मेरे इस वज़ू की तरह वज़ू किया और उसके बाद दो रकात नमाज़ पढ़ी, जिसमें उसने अपने जी में कोई बात न की, अल्लाह उसके पिछले सारे गुनाह माफ़ कर देता है।
जो अच्छी तरह वज़ू करता है, उसके जिस्म से पाप निकल जाते हैं, यहाँ तक कि नाख़ून के नीचे से भी निकल जाते हैं।
पवित्रता आधा ईमान है, अल-हम्दु लिल्लाह तराज़ू को भर देता है, सुबहानल्लाह और अल-हम्दु लिल्लाह दोनों मिलकर आकाश एवं धरती के बीच के खाली स्थान को भर देते हैं
जब तुममें से कोई वज़ू करे, तो अपनी नाक में पानी डालकर नाक झाड़े, और जो ढेलों से इस्तिंजा (शौच या मूत्र से पवित्रता अर्जन) करे, वह बेजोड़ (विषम) संख्या प्रयोग करे
शैतान तुममें से हर व्यक्ति के सर के पीछ रात में सोते समय तीन गाँठ लगा देता है और हर गाँठ पर यह कहकर फूँक मारता है कि सो जा, अभी रात बहुत बाक़ी है।
हम अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के लिए मिसवाक और वुज़ू का पानी तैयार रखते थे। फिर अल्लाह जितनी रात को चाहता आपको जगाता। तो आप उठते, वज़ू करते और नमाज़ पढ़ते थे।
जब तुममें से कोई नींद से जागे, तो तीन बार अपनी नाक में पानी डालकर झाड़ ले, क्योंकि शैतान उसकी नाक के अंदर रात गुज़ारता है।
अल्लाह के रसूल- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने वज़ू किया, तो कुल्ली की, फिर नाक में पानी डालकर नाक झाड़ा, फिर तीन बार चेहरे को धोया, दाहिने तथा बाएँ हाथ को तीन-तीन बार धोया, अपने सिर का मसह हाथ के बचे हुए पानी से नहीं बल्कि नए पानी से किया और दोनों पैरों को साफ़ करके धोया।
एक आदमी ने वज़ू किया और पैर में नाखून के बराबर जगह सूखी छोड़ दी। अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उसे देखा, तो फ़रमाया : “जाओ और अच्छी तरह वज़ू कर लो।” अतः, वह वापस गया और फिर उसने बाद में नमाज़ पढ़ी।
“अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम एक साअ से पाँच मुद तक पानी से स्नान करते और एक मुद पानी से वज़ू करते थे।”
“जो मुसलमान अच्छी तरह वज़ू करता है, फिर खड़े होकर मन तथा तन के साथ दो रकात नमाज़ पढ़ता है, उसके लिए जन्नत अनिवार्य हो जाती है।”
अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने अपनी किसी पत्नी का चुंबन लिया, फिर नमाज़ के लिए गए और वज़ू नहीं किया
जब तुममें से कोई अपने पेट में कोई चीज़ पाए और उसके लिए यह निर्णय लेना कठिन हो कि उससे कुछ निकला है या नहीं, तो मस्जिद से उस समय तक हरगिज़ न निकले, जब तक आवाज़ सुनाई न दे या बदबू महसूस न हो।
अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के ज़माने में हमें इस तरह का खाना कम ही मिला करता था। जब हमें इस तरह का खाना मिलता, तो हमारे पास रूमाल नहीं होते, अतः अपनी हथेलियों, बाज़ुओं और क़दमों में पोंछ लेते और फिर वज़ू किए बिना ही नमाज़ पढ़ लेते।
जिसे खुशी हो कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- का वज़ू सीखे, तो वह जान ले कि आपका वज़ू इसी तरह का हुआ करता था।
वज़ू सम्पूर्ण रूप से करो और उंग्लियों के बीच ख़िलाल करो तथा यदि रोज़े से न हो तो नाक में पानी डालकर अच्छी तरह से नाक झाड़ो।
मैंने अम्मार बिन यासिर को दाढ़ी का ख़िलाल करते देखा तो उनसे कहा गया, अथवा यह कहा कि मैंने उनसे कहा : क्या आप दाढ़ी का खिलाल करते हैं? उन्होंने कहा : “क्यों न करूँ? बेशक मैंने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को अपनी दाढ़ी का ख़िलाल करते हुए देखा है।”
नबी- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पास दो तिहाई मुद पानी लाया गया, तो आपने -धाने के लिए- अपने बाज़ू को मलना शुरू कर दिया।
अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के सहाबा आपके ज़माने में इशा की नमाज़ की प्रतीक्षा करते रहते थे, यहां तक कि उनके सिर नींद के कारण झुकने लगते थे, फिर नमाज़ पढ़ते और दोबारा वजू नहीं करते थे
उसने पूछा: क्या मैं बकरियों के बाड़े में नमाज़ पढ़ूँ? आपने फ़रमाया: हां। उसने पूछा: क्या मैं ऊँटों के रहने की जहग में नमाज़ पढ़ूँ? आपने फ़रमाया: नहीं।
अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम एक साअ पानी से जनाबत का स्नान और एक मुद्द पानी से वज़ू कर लिया करते थे।
जब कोई मुस्लिम या मोमिन बंदा वज़ू करता है और अपना चेहरा धोता है, तो उसके चेहरे से वह सारे गुनाह पानी के साथ या पानी की अंतिम बूँद के साथ निकल जाते हैं, जो उसने अपनी आँखों से देखने के क्रम में किए थे।