عَنْ مُعَاذِ بْنِ جَبَلٍ رضي الله عنه:
أَنَّ رَسُولَ صَلَّى عَلَيْهِ وَسَلَّمَ أَخَذَ بِيَدِهِ، وَقَالَ: «يَا مُعَاذُ، وَاللَّهِ إِنِّي لَأُحِبُّكَ»، فَقَالَ: «أُوصِيكَ يَا مُعَاذُ لَا تَدَعَنَّ فِي دُبُرِ كُلِّ صَلَاةٍ تَقُولُ: اللَّهُمَّ أَعِنِّي عَلَى ذِكْرِكَ وَشُكْرِكَ وَحُسْنِ عِبَادَتِكَ».
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मुआज़ बिन जबल रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि :
अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उनका हाथ पकड़ा और फ़रमाया : "ऐ मुआज़! अल्लाह की क़सम, मैं तुमसे मोहब्बत रखता हूँ।" आगे फ़रमाया : "ऐ मुआज़! मैं तुमको वसीयत करता हूँ कि हर नमाज़ के बाद यह दुआ पढ़ना हरगिज़ न छोड़ना : ऐ अल्लाह! अपने ज़िक्र करने, शुक्र करने और बेहतर अंदाज़ में अपनी इबादत करने में मेरी मदद फ़रमा।"