عَنْ عَائِشَةَ أُمِّ المُؤْمِنينَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهَا قَالَتْ:
مَا صَلَّى النَّبِيُّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ صَلاَةً بَعْدَ أَنْ نَزَلَتْ عَلَيْهِ: {إِذَا جَاءَ نَصْرُ اللَّهِ وَالفَتْحُ} [النصر: 1] إِلَّا يَقُولُ فِيهَا: «سُبْحَانَكَ رَبَّنَا وَبِحَمْدِكَ اللَّهُمَّ اغْفِرْ لِي».
وعَنْها قَالَتْ: كَانَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يُكْثِرُ أَنْ يَقُولَ فِي رُكُوعِهِ وَسُجُودِهِ: «سُبْحَانَكَ اللهُمَّ رَبَّنَا وَبِحَمْدِكَ، اللهُمَّ اغْفِرْ لِي» يَتَأَوَّلُ الْقُرْآنَ.
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मुसलमानों की माता आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- का वर्णन है, वह कहती हैं :
अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने सूरा नस्र उतरने के बाद जब भी कोई नमाज़ पढ़ी, उसके अंदर यह दुआ ज़रूर पढ़ी : (ऐ अल्लाह, ऐ हमारे रब, तू अपनी प्रशंसा के साथ पाक है। ऐ अल्लाह, तू मुझे माफ कर दे।) उन्हीं से रिवायत है, वह कहती हैं : अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- रुकू तथा सजदे में यह दुआ बहुत ज़्यादा पढ़ा करते थे : (ऐ अल्लाह, ऐ हमारे रब, तू अपनी प्रशंसा के साथ पाक है। ऐ अल्लाह, तू मुझे माफ कर दे।) दरअसल ऐसा करके आप क़ुरआन के अंदर दिए गए आदेश का पालन करते थे।