عَنْ عَائِشَةَ أُمِّ المُؤْمِنينَ رَضِيَ اللهُ عَنْهَا قَالَتْ:
كَانَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ إِذَا دَخَلَ الْعَشْرُ أَحْيَا اللَّيْلَ، وَأَيْقَظَ أَهْلَهُ، وَجَدَّ وَشَدَّ الْمِئْزَرَ.
[صحيح] - [متفق عليه] - [صحيح مسلم: 1174]
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मुसलमानों की माता आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- का वर्णन है, वह कहती हैं :
जब रमज़ान के अंतिम दस दिन आते, तो अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- रातों को जागते, अपने घर के लोगों को जगाते, ख़ूब इबादतें करते और कमर कस लेते।
[स़ह़ीह़] - [इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है] - [सह़ीह़ मुस्लिम - 1174]
जब रमज़ान की अंतिम दस रातें आतीं, तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि रात-रात भर विभिन्न प्रकार की इबादतें करते रहते और अपने घर वालों को भी नमाज़ के लिए जगाते, आम दिनों की तुलना में इबादत में अपने आप को अधिक लगाते अथा खुद को उसके लिए समर्पित कर देते और अपनी पत्नियों से अलग रहते।