عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رضي الله عنه عَنِ النَّبِيِّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ:
«مَنْ كَانَتْ لَهُ امْرَأَتَانِ فَمَالَ إِلَى إِحْدَاهُمَا، جَاءَ يَوْمَ الْقِيَامَةِ وَشِقُّهُ مَائِلٌ».

[صحيح] - [رواه أبو داود والترمذي والنسائي وابن ماجه وأحمد] - [سنن أبي داود: 2133]
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अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है :
"जिसकी दो पत्नियाँ हों और उसका झुकाव किसी एक की ओर हो, वह क़यामत के दिन इस अवस्था में आएगा कि उसका एक पहलू झुका हुआ होगा।"

[स़ह़ीह़] - [इस ह़दीस़ को अबू दावूद, तिर्मिज़ी, नसई, इब्न-ए-माजह और अह़मद ने रिवायत किया है] - [सुनन अबू दावूद - 2133]

व्याख्या

अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- फ़रमा रहे हैं कि जिस व्यक्ति की एक से अधिक पत्नियाँ हों और उनके बीच उन बातों में न्याय न करे जिनमें न्याय कर सकता हो , मसलन ख़र्च, रहने-सहने के लिए घर की उपलब्धता, वस्त्र एवं रात बिताने में बराबरी न करे, तो क़यामत के दिन उसकी सज़ा यह होगी कि उसके शरीर का आधा भाग झुका हुआ होगा। बिलकुल उसी तरह, जैसे अपने व्यवहार में एक ओर झुका हुआ था।

हदीस का संदेश

  1. दो या दो से अधिक पत्नियाँ होने की अवस्था में उनके बीच न्याय के साथ अधिकारों का वितरण करना पति पर अनिवार्य है। जिन बातों में न्याय कर सकता है तो उसके लिए यह हराम है कि उनमें किसी एक पत्नी की ओर झुक जाए, चाहे ख़र्च करने के मामले में हो, रात बिताने के मामले में हो या अच्छे व्यवहार आदि के मामले में।
  2. बारी और अन्य ऐसी चीज़ों का समान वितरण, जो इन्सान के नियंत्रण में हैं। जहाँ तक प्रेम और दिल का झुकाव आदि का प्रश्न है, जो इन्सान के नियंत्रण में नहीं हैं, वे इस हदीस के अंतर्गत नहीं आते। इसी बात को इस आयत में भी बयान किया गया है : "तुम चाहो तो भी औरतों के बीच न्याय नहीं कर सकते।" [सूरा निसा : 129]
  3. इन्सान को प्रतिफल उसी कोटि का मिलेगा, जिस कोटि का उसका अमल रहा होगा। अतः जो पति दुनिया में एक पत्नी को छोड़कर दूसरी पत्नी की ओर झुक जाता है, वह जब क़यामत के दिन उपस्थित होगा, तो उसका शरीर एक ओर झुका हुआ होगा।
  4. बंदों के अधिकारों का महत्व। बंदों के अधिकार माफ़ नहीं होंगे। क्योंकि बंदे अपने अधिकारों को प्राप्त करने के लिए प्रयासरत रहा करते हैं।
  5. जब किसी पुरुष को यह भय हो कि वह अपनी पत्नियों के बीच न्याय नहीं कर पाएगा, तो उसके लिए एक ही पत्नी रखना मुसतहब है, ताकि धर्म का उल्लंघन न हो। अल्लाह तआला का कथन है : "लेकिन यदि तुम्हें भय हो कि तुम न्याय नहीं कर पाओगे, तो एक ही पत्नी काफ़ी है।" [अन-निसा : 3]
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