عَنْ ابْنِ عُمَرَ رَضيَ اللهُ عنهُما أَنَّهُ سَمِعَ رَسُولَ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ:
«مَا حَقُّ امْرِئٍ مُسْلِمٍ لَهُ شَيْءٌ يُوصِي فِيهِ، يَبِيتُ ثَلَاثَ لَيَالٍ، إِلَّا وَوَصِيَّتُهُ عِنْدَهُ مَكْتُوبَةٌ»، قَالَ عَبْدُ اللهِ بْنُ عُمَرَ رضي الله عنهما: «مَا مَرَّتْ عَلَيَّ لَيْلَةٌ مُنْذُ سَمِعْتُ رَسُولَ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ ذَلِكَ إِلَّا وَعِنْدِي وَصِيَّتِي».
[صحيح] - [متفق عليه] - [صحيح مسلم: 1627]
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अब्दुल्लाह बिन उमर -रज़ियल्लाहु अनहुमा- का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है :
"किसी मुसलमान के लिए उचित नहीं है कि उसके पास कोई वस्तु हो, जिसकी वह वसीयत करना चाहता हो और वह वसीयतनामा लिखे बिना दो रात भी गुज़ारे।" अब्दुल्लाह बिन उमर -रज़ियल्लाहु अनहुमा- फ़रमाते हैं : "जबसे मैंने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को यह फ़रमाते हुए सना है, मेरी कोई रात्रि वसीयतनामा लिखे बिना नहीं गुज़री।"
[स़ह़ीह़] - [इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है] - [सह़ीह़ मुस्लिम - 1627]
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया है कि जिस मुसलमान के पास वसीयत करने लायक़ कोई धन या अधिकार आदि हो, चाहे मामूली ही क्यों न हो, उसकी तीन रातें इस अवस्था में नहीं गुज़रनी चाहिएँ कि उसके पास वसीयत लिखी हुई न हो। अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अनहुमा कहते हैं : जबसे मैंने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से यह हदीस सुनी है, तबसे मेरी एक रात भी ऐसी नहीं गुज़री कि वसीयत मेरे पास लिखी हुई न हो।