عَنْ مُصْعَبِ بْنِ سَعْدٍ قَالَ: رَأَى سَعْدٌ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ أَنَّ لَهُ فَضْلًا عَلَى مَنْ دُونَهُ، فَقَالَ النَّبِيُّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ:
«هَلْ تُنْصَرُونَ وَتُرْزَقُونَ إِلَّا بِضُعَفَائِكُمْ».
[صحيح] - [رواه البخاري] - [صحيح البخاري: 2896]
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मुस्अब बिन साद कहते हैं : साद -रज़ियल्लाहु अनहु- के मन में आया कि उन्हें अपने से कमतर लोगों पर कुछ श्रेष्ठता प्राप्त है। अतः नबी सल्ल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया :
"तुम्हारे कमज़ोर लोगों के कारण ही तुम्हारी सहायता की जाती है और तुम्हें रोज़ी दी जाती है।"
[स़ह़ीह़] - [इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है] - [सह़ीह़ बुख़ारी - 2896]
साद बिन अबू वक़्क़ास रज़ियल्लाहु अनहु ने सोच रखा था कि चूँकि वह एक बहादुर इन्सान हैं, इसलिए उन्हें दूसरे कमज़ोर लोगों पर उत्कृष्टता प्राप्त है। अतः अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कह दिया : तुम्हें जो सहायता एवं रोज़ी मिलती है, वह तुम्हारे अंदर मौजूद कमज़रों लोगों की दुआओं, नमाज़ों एवं अल्लाह के प्रति निष्ठा के कारण मिलती है। क्योंकि कमजोर लोगों के हृदय संसार की चमक-दमक में उलझे नहीं होते, इसीलिए उनकी दुआओं में आम तौर पर अधिक सच्चाई और उनकी इबादतों में अधिक विनम्रता होती है।