عَنْ أَنَسٍ رَضيَ اللهُ عنه قَالَ:
كَانَتْ عَامَّةُ وَصِيَّةِ رَسُولِ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ حِينَ حَضَرَهُ الْمَوْتُ: «الصَّلَاةَ وَمَا مَلَكَتْ أَيْمَانُكُمْ، الصَّلَاةَ وَمَا مَلَكَتْ أَيْمَانُكُمْ»، حَتَّى جَعَلَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يُغَرْغِرُ بِهَا صَدْرُهُ، وَمَا يَكَادُ يُفِيضُ بِهَا لِسَانُهُ.
[صحيح] - [رواه النسائي في السنن الكبرى وابن ماجه] - [مسند أحمد: 12169]
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अनस -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है, वह कहते हैं :
जब अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की मृत्यु का समय आ गया, तो आपने सबसे ज़्यादा जिस बात की वसीयत की, वह यह थी : "नमाज़ तथा अपने मातहत काम कर रहे लोगों का ख़्याल रखना। नमाज़ तथा अपने मातहत काम कर रहे लोगों का ख़्याल रखना।" अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- इन शब्दों को दोहराते रहे, यहाँ कि ये आपके गले में आकर फँसने लगे और ज़बान से सही तरीक़े से अदा न हो सके।
[सह़ीह़] - [رواه النسائي في الكبرى وابن ماجه] - [مسند أحمد - 12169]
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मौत से पहले तथा अपने जीवन की अंतिम घड़ियों में अपनी उम्मत को जिस बात की सबसे अधिक ताकीद की, वह यह थी : तुम नमाज़ अवश्य ही पाबंदी से अदा करना और उसकी उपेक्षा न करना और अपने मातहत दासों, दासियों के अधिकार तथा उनके साथ अच्छा व्यवहार करना। अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम इन शब्दों को लगातार दोहराते रहे, यहाँ कि आवाज़ गले में फँसने लगी और आपकी बात समझनी मुश्किल हो गई।