عن أبي موسى الأشعري -رضي الله عنه- قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللَّهِ - صلى الله عليه وسلم -: «إنّي والله -إنْ شاء الله- لا أَحلف على يمين، فأرى غيرها خيراً منها إلاَّ أَتيتُ الَّذِي هو خير، وتحلَّلْتُهَا».
[صحيح.] - [متفق عليه.]
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अबू मूसा अशअरी (रज़ियल्लाहु अन्हु) कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः अल्लाह की क़सम, (यदि अल्लाह ने चाहा) मैं जब भी किसी बात की क़सम खाऊँगा, फिर दूसरी बात को क़सम पर कायम रहने से बेहतर देखूँगा, तो बेहतर पर अमल करूँगा और क़सम का कफ़्फ़ारा अदा कर दूँगा।
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व्याख्या

यहाँ नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने स्वयं अपने बारे में बताया है कि यदि आप किसी काम के करने अथवा न करने की क़सम खाएँगे और फिर महसूस करेंगे कि क़सम को जारी न रहना ही उत्तम है, तो क़सम तोड़कर जो बेहतर है, वह करेंगे और क़सम का कफ़्फ़ारा अदा करेंगे।

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