عَنْ أَبِي سَعِيدٍ الْخُدْرِيِّ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ عَنِ النَّبِيِّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ أَنَّهُ قَالَ:
«لَا يَمْنَعَنَّ رَجُلًا مِنْكُمْ مَخَافَةُ النَّاسِ أَنْ يَتَكَلَّمَ بِالْحَقِّ إِذَا رَآهُ أَوْ عَلِمَهُ».

[صحيح] - [رواه الترمذي وابن ماجه وأحمد] - [مسند أحمد: 11403]
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अबू सईद ख़ुदरी -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है :
"तुममें से किसी व्यक्ति को लोगों का भय हक़ बात बोलने से हरगिज़ न रोके, जब वह उसे देख रहा हो या जानता हो।"

[स़ह़ीह़] - [इसे तिर्मिज़ी, इब्न-ए-माजह और अह़मद ने रिवायत किया है] - [मुसनद अह़मद - 11403]

व्याख्या

अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने अपने सहाबा को संबोधित किया और इस दौरान एक बात ताकीद के साथ यह कही कि किसी मुसलमान को लोगों का भय और उनका प्रभाव हक़ बोलने या उसका आदेश देने से न रोके, जब वह उसे देख रहा हो या जानता हो।

हदीस का संदेश

  1. इस हदीस में इस बात की प्रेरणा दी गई है कि लोगों के भय से हक़ बात को छोड़ा न जाए तथा उसे छुपाया न जाए।
  2. हक़ बात बोलने का मतलब यह नहीं है कि बोलने का अंदाज़ शालीन न हो, हिकमत से काम न लिया जाए और अपनी बात अच्छे से न रखी जाए।
  3. ग़लत चीज़ का खंडन करना और अल्लाह का हक़ जब बंदों के हितों से टकराता हो, तो अल्लाह के हक़ को आगे रखना अनिवार्य है।
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