عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رضي الله عنه قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ:
«رَغِمَ أَنْفُ رَجُلٍ ذُكِرْتُ عِنْدَهُ فَلَمْ يُصَلِّ عَلَيَّ، وَرَغِمَ أَنْفُ رَجُلٍ دَخَلَ عَلَيْهِ رَمَضَانُ ثُمَّ انْسَلَخَ قَبْلَ أَنْ يُغْفَرَ لَهُ، وَرَغِمَ أَنْفُ رَجُلٍ أَدْرَكَ عِنْدَهُ أَبَوَاهُ الكِبَرَ فَلَمْ يُدْخِلاَهُ الجَنَّةَ».
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अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है :
"उस व्यक्ति की नाक मिट्टी में मिल जाए जिसके सामने मेरा ज़िक्र किया जाए और वह मुझपर दरूद न पढ़े, उस व्यक्ति की नाक मिट्टी में मिल जाए जिसके सामने रमज़ान महीना आए एवं निकल जाए और वह क्षमा प्राप्ति का सामान न कर सके और उस व्यक्ति की नाक भी मिट्टी में मिल जाए जो अपने माता-पिता को बुढ़ापे की अवस्था में पाए और दोनों उसे जन्नत में दाख़िल न कर सकें।"