عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رضي الله عنه قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ:
«إِنَّ اللهَ يَرْضَى لَكُمْ ثَلَاثًا، وَيَكْرَهُ لَكُمْ ثَلَاثًا، فَيَرْضَى لَكُمْ: أَنْ تَعْبُدُوهُ، وَلَا تُشْرِكُوا بِهِ شَيْئًا، وَأَنْ تَعْتَصِمُوا بِحَبْلِ اللهِ جَمِيعًا وَلَا تَفَرَّقُوا، وَيَكْرَهُ لَكُمْ: قِيلَ وَقَالَ، وَكَثْرَةَ السُّؤَالِ، وَإِضَاعَةِ الْمَالِ».

[صحيح] - [رواه مسلم] - [صحيح مسلم: 1715]
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अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है :
"अल्लाह तुम्हारे लिए तीन बातों को पसंद करता है और तुम्हारे लिए तीन बातों को नापसंद करता है। उसे तुम्हारे लिए पसंद है कि: तुम केवल उसी की इबादत करो, किसी को उसका साझी न बनाओ और सब मिलकर अल्लाह की रस्सी को मज़बूती से पकड़ लो और बिखराव का शिकार होने से बचो। जबकि उसे तुम्हारे लिए नापसंद है: बेकार की बातें करना, बहुत ज़्यादा प्रश्न करन और धन बर्बाद करन।"

[صحيح] - [رواه مسلم] - [صحيح مسلم - 1715]

व्याख्या

अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने बताया है कि अल्लाह बंदों की तीन आदतों को पसंद करता है और तीन आदतों को नापसंद। जिन तीन आदतों को पसंद करता है, वह इस प्रकार हैं : बंदे केवल उसी की इबादत करें और किसी को उसका साझी न बनाएँ, सब मिलकर अल्लाह के वचन, क़ुरान एवं सुन्नत को मज़बूती से पकड़े रहें तथा मुसलमानों की जमात से अलग न हों। और जिन तीन आदतों को नापसंद करता है, वह हैं, ऐसी बातें करना जिनका कोई फ़ायदा न हो, जो बातें सामने न आई हों उनके बारे में पूछना या लोगों से उनका धन, उनके पास मौजूद चीज़ें और ऐसी वस्तुएँ माँगना जिन्हें माँगना आवश्यक न हो और माल बर्बाद करना और ग़ैर-शरई कार्यों में खर्च करना और माल को बर्बादी के हवाले करना।

हदीस का संदेश

  1. अल्लाह इबादत में निष्ठा को पसंद करता है और अविस्वास से नफ़रत करता है।
  2. अल्लाह की रस्सी को मज़बूती से पकड़े रहने की प्रेरणा कि इससे एकता एवं आपसी प्रेम पैदा होता है।
  3. जमात के साथ रहने की प्रेरणा तथा जमात से जुड़े रहने एवं उसे एकजुट रखने का आदेश, जबकि इसकी विपरीत दिशा में चलते हुए बिखराव के शिकार होने और आपसी कलह में फँसने की मनाही।
  4. ऐसी चीज़ों के बारे में बहुत ज़्यादा बात करने की मनाही, जिनसे इन्सान का कोई सरोकार न हो। क्योंकि बात अगर जायज़ चीज़ों के बारे में हो रही है, तो बिना मतलब समय बर्बाद हो रहा है और अगर हराम चीज़ों के बारे में हो रही है, तो गुनाह का पहाड़ खड़ा हो रहा है।
  5. लोगों के टोह में रहने तथा उनकी बातों एवं कार्यों की नक़ल उतारने की मनाही।
  6. लोगों से उनका धन बहुत ज़्यादा माँगने की मनाही।
  7. धन नष्ट करना हराम है। इस हदीस में धन को लाभकारी कार्यों में खर्च करने की प्रेरणा दी गई है।
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