1. मुख्य
  2. श्रेणियाँ
  3. फ़िक़्ह तथा उसूल-ए-फ़िक़्ह

हदीस “जमात के साथ नमाज़ अकेले की नमाज़ से सवाब में पच्चीस दर्जे ज़्यादा है और रात दिन के फरिश्ते फज्र की नमाज़ में जमा होते हैं।”

عَن أَبي هُرَيْرَةَ رضي الله عنه قَالَ: سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَقُولُ:
«تَفْضُلُ صَلاَةُ الجَمِيعِ صَلاَةَ أَحَدِكُمْ وَحْدَهُ، بِخَمْسٍ وَعِشْرِينَ جُزْءًا، وَتَجْتَمِعُ مَلاَئِكَةُ اللَّيْلِ وَمَلاَئِكَةُ النَّهَارِ فِي صَلاَةِ الفَجْرِ» ثُمَّ يَقُولُ أَبُو هُرَيْرَةَ: فَاقْرَءُوا إِنْ شِئْتُمْ: {إِنَّ قُرْآنَ الفَجْرِ كَانَ مَشْهُودًا} [الإسراء: 78].

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है, वह कहते हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को कहते हुए सुना है :
“जमात के साथ नमाज़ अकेले की नमाज़ से सवाब में पच्चीस दर्जे ज़्यादा है और रात दिन के फरिश्ते फज्र की नमाज़ में जमा होते हैं।” फिर अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अनहु- कहते हैं : अगर चाहो तो यह आयत पढ़ लो : “फज्र में क़ुरान की तिलावत पर फरिश्ते हाज़िर होते हैं।” [सूरा अल-इस्रा : 78]

स़ह़ीह़ इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है सह़ीह़ बुख़ारी - 648

स्पष्टीकरण

अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- बता रहे हैं कि एक व्यक्ति द्वारा इमाम के साथ जमात में पढ़ी गई एक नमाज़ का सवाब एवं प्रतिफल, घर या बाज़ार में अकेले पढ़ी गई पच्चीस नमाज़ों के सवाब तथा प्रतिफल से उत्तम है। इसके बाद अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने बताया कि रात और दिन के फ़रिश्ते फ़ज्र की नमाज़ में एकत्र हो जाते हैं। फिर अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अनहु- ने इसका प्रमाण प्रस्तुत करते हुए फ़रमाया :
अगर तुम चाहो, तो यह आयत पढ़ लो : "निःसंदेह फ़ज्र की नमाज़ (फ़रिश्तों की) उपस्थिति का समय है।" [सूरा इसरा : 78] यानी फ़ज्र की नमाज़ के समय रात के फ़रिश्ते तथा दिन के फ़रिश्ते दोनों मौजूद रहते हैं।

हदीस के कुछ फ़ायदे

  1. इब्न-ए-हजर कहते हैं : मस्जिद में जमात के साथ पढ़ी गई नमाज़ घर और बाज़ार में जमात के साथ तथा अकेले पढ़ी गई नमाज़ से बेहतर है,(फिर कहा:) यह बात इब्ने दक़ीक़ अल ईद ने कही है।
  2. इस हदीस से फ़ज्र की नमाज़ की फ़ज़ीलत मालूम होती है, क्योंकि इसकी विशेषता यह है कि इसमें रात एवं दिन के फ़रिश्ते एकत्र होते हैं।
  3. इब्न-ए-बाज़ कहते हैं : एक मोमिन को यह बड़ा सवाब प्राप्त करने के लिए पाबंदी से जमात के साथ नमाज़ पढ़ने का प्रयास करना चाहिए, चाहे घर दूर ही क्यों न हो।
  4. नववी ने इस आशय की रिवायतों कि जमात के साथ पढ़ी गई नमाज़ अकेले पढ़ी गई नमाज़ से पच्चीस गुना उत्तम है तथा इस आशय की रिवायतों के बीच कि सत्ताईस गुना उत्तम है, सामंजस्य के संबंध में कहा है : इनके बीच सामंजस्य के निम्नलिखित तीन तरीक़े हैं : 1- यहाँ कोई विरोधाभास नहीं है। क्योंकि कम का ज़िक्र अधिक का खंडन नहीं करता। इस्लामी न्यायशास्त्र के सिद्धांतविदों (उसूल-ए- फ़िक्ह के ज्ञानियों) के यहाँ संख्या का विपरीतार्थ मान्य नहीं है। 2- ऐसा हो सकता है कि आपने पहले कम के बारे में बताया और फिर जब अधिक के बारे में अल्लाह के द्वारा अवगत कराए गए, तो उसके बारे में बता दिया। 3- सवाब नमाज़ियों एवं नमाज़ की स्थितियों के अनुसार घटता-बढ़ता रहता है। किसी को पच्चीस गुना मिलता है तो किसी को सत्ताईस गुना। ऐसा नमाज़ की संपूर्णता, सुन्नत के अनुसरण, विनयशीलता, जमात की भव्यता, जमात में शामिल लोगों की फ़ज़ीलत तथा स्थान के मर्यादा आदि के अनुसार हुआ करता है, और ज़्यादा अल्लाह ही जानता है।

अनुवाद दिखाएँ

39 भाषा
EN English الإنجليزية
UR اردو الأوردية
ES Español الإسبانية
ID Indonesia الإندونيسية
BN বাংলা البنغالية
TR Türkçe التركية
RU Русский الروسية
BS Bosanski البوسنية
SI සිංහල السنهالية
ZH 中文 الصينية
FA فارسی الفارسية
VI Tiếng Việt الفيتنامية
TL Tagalog تجالوج
KU Kurdî الكردية
HA Hausa الهوسا
PT Português البرتغالية
ML മലയാളം المليالم
TE తెలుగు التلغو
SW Kiswahili السواحيلية
MY မြန်မာ البورمية
TH ไทย التايلندية
PS پښتو بشتو
AS অসমীয়া الأسامية
SQ Shqip الألبانية
AM አማርኛ الأمهرية
NL Nederlands الهولندية
GU ગુજરાતી الغوجاراتية
PRS دری الدرية
SR Српски الصربية
RO Română الرومانية
HU Magyar المجرية
MOS Moore الموري
KN ಕನ್ನಡ الكانادا
UK Українська الأوكرانية
KA ქართული الجورجية
MK Македонски المقدونية
KM ភាសាខ្មែរ الخميرية
PA ਪੰਜਾਬੀ البنجابية
MR मराठी الماراثية