عَنْ جَابِرِ بْنِ سَمُرَةَ رَضيَ اللهُ عَنْهُ:
أَنَّ النَّبِيَّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ كَانَ إِذَا صَلَّى الفَجْرَ جَلَسَ فِي مُصَلَّاهُ حَتَّى تَطْلُعَ الشَّمْسُ حَسَنًا، وَقَالَ: كَانَ لَا يَقُومُ مِنْ مُصَلَّاهُ الَّذِي يُصَلِّي فِيهِ الصُّبْحَ أَوِ الغَدَاةَ، حَتَّى تَطْلُعَ الشَّمْسُ، فَإِذَا طَلَعَتِ الشَّمْسُ قَامَ، وَكَانُوا يَتَحَدَّثُونَ فَيَأْخُذُونَ فِي أَمْرِ الجَاهِلِيَّةِ، فَيَضْحَكُونَ وَيَتَبَسَّمُ.
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जाबिर बिन समुरा रज़ियल्लाहु अन्हु का वर्णन है कि :
नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जब फ़ज्र की नमाज़ पढ़ लेते, तो अपनी नमाज़ की जगह पर बैठे रहते, यहाँ तक कि सूरज अच्छी तरह निकल आता, और (वर्णनकर्ता ने) कहा : आप अपनी उस जगह से जहाँ सुबह की नमाज़ पढ़ते थे, सूरज निकलने तक नहीं उठते थे। जब सूरज निकल आता, तो उठ जाते। सहाबा बात करते हुए अज्ञानता काल की बातों को छेड़ देते और हँसते तो आप मुस्कुरा देते।