عن أُمُّ سَلَمَة رضي الله عنها أن رسول الله صلى الله عليه وسلم سَمِعَ جَلَبَةَ خَصْمٍ بِبَابِ حُجْرَتِهِ، فَخَرَجَ إلَيْهِمْ، فقال: «ألا إنما أنا بشر، وإنما يأتيني الخصم، فلعل بعضكم أن يكون أبلغ من بعض؛ فَأَحْسِبُ أَنَّهُ صَادِقٌ؛ فَأَقْضِي لَهُ، فمن قضيت له بحق مسلم فإنما هي قطعة من نار، فَلْيَحْمِلْهَا أَوْ يَذَرْهَا». المزيد
उम्मे सलमा (रज़ियल्लाहु अन्हा) से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने अपने कमरे के द्वार पर कुछ झगड़ने वालों की आवाज़ सुनी, तो निकलकर उनके पास आए और फ़रमायाः "सुनो, मैं भी एक इनसान हूँ। मेरे पास झगड़ने वाले आते हैं। संभव है कि तुम में से कोई दूसरे के मुक़ाबले अपनी बात अधिक सफ़ाई से रखता हो और उसे सच्चा समझकर मैं उसके हक़ में फ़ैसला कर दूँ। अतः, जिसे मैंने किसी मुसलमान का हक़ दे दिया, वह दरअसल एक आग का टुकड़ा है। चाहे तो उसे उठा ले या चाहे तो छोड़ दे।"