عَنْ عَلِيٍّ رَضِيَ اللهُ عَنْهُ قَالَ
كَانَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يُقْرِئُنَا القُرْآنَ عَلَى كُلِّ حَالٍ مَا لَمْ يَكُنْ جُنُبًا.

[حسن] - [رواه أبو داود والترمذي والنسائي وابن ماجه وأحمد] - [سنن الترمذي: 146]
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अली रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है, वह कहते हैं :
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हमें हर हाल में क़ुरआन पढ़ाते थे, सिवाय जनाबत (अपवित्रता) की हालत के।

[ह़सन] - [इस ह़दीस़ को अबू दावूद, तिर्मिज़ी, नसई, इब्न-ए-माजह और अह़मद ने रिवायत किया है] - [सुनन तिर्मिज़ी - 146]

व्याख्या

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अपने सहाबा को हर हाल में क़ुरआन सिखाते और पढ़ाते थे, जब तक कि अपनी पत्नी से सहवास के कारण जनाबत (अशुद्धता) की हालत में न होते।

हदीस का संदेश

  1. जब तक जुंबी व्यक्ति स्नान न कर ले, उसके लिए क़ुरआन पढ़ना जायज़ नहीं है।
  2. व्यावहारिक रूप से शिक्षा देना।
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भाषा: अंग्रेज़ी उर्दू इंडोनेशियाई अधिक (28)
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