عن أبي هريرة -رضي الله عنه- مرفوعًا: «أن رجلا زَارَ أخًا له في قرية أخرى، فأَرْصَدَ الله -تعالى- على مَدْرَجَتِهِ مَلَكًا، فلما أتى عليه، قال: أين تريد؟ قال: أريد أخًا لي في هذه القرية، قال: هل لك عليه من نعمةٍ تَرُبُّهَا عليه؟ قال: لا، غيرَ أني أَحْبَبْتُهُ في الله -تعالى-، قال: فإني رسولُ الله إليك بأنَّ الله قد أَحَبَّكَ كما أَحْبَبْتَهُ فيه».
[صحيح.] - [رواه مسلم.]
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अबू हुरैरा- रज़ियल्लाहु अन्हु- से मरफ़ूअन वर्णित है कि( एक व्यक्ति अपने भाई से दूसरे गाँव में मिलने गया, तो अल्लाह ने उसकी सुरक्षा के लिए रास्ते में एक फ़रिश्ता नियुक्त कर दिया। जब वह फ़रिश्ते के पास आया, तो फ़रिश्ते ने पूछाः तुम कहाँ जा रहे हो? उसने कहाः मैं इस गाँव में अपने एक भाई के पास जा रहा हूँ। फ़रिश्ते ने पूछाः क्या तुम्हारा उसके ऊपर कोई एहसान है, जिसे तुम बढ़ाने जा रहे हो (जिस की तुम रक्षा करने जा रहे हो)? उसने कहाः नहीं, बात केवल इतनी है कि मैं उससे अल्लाह के लिए मोहब्बत रखता हूँ। फ़रिश्ते ने कहाः मैं तुम्हारे पास अल्लाह का संदेश लेकर आया हूँ कि अल्लाह तुमसे मोहब्बत रखता है, जैसे तुम अल्लाह के लिए उससे मोहब्बत रखते हो।"
सह़ीह़ - इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।

व्याख्या

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