عن عبد الله بن عمر -رضي الله عنهما- قال: «نهى رسول الله -صلى الله عليه وسلم- عن الْوِصَالِ، قالوا: إنك تواصل؟ قال: إني لَسْتُ كَهَيْئَتِكُمْ، إني أُطْعَمُ وَأُسْقَى». وفي رواية أبي سعيد الخدري -رضي الله عنه-: «فَأَيُّكُمْ أراد أن يواصل فليواصل إلى السَّحَرِ».
[صحيح.] - [متفق عليه.]
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अब्दुल्लाह बिन उमर- रज़ियल्लाहु अन्हुमा- कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने निरंतर रोज़ा रखने से मना किया। लोगों ने कहा कि आप तो निरंतर रोज़े रखते हैं? आपने फ़रमाया: मैं तुम्हरे जैसा नहीं हूँ। मुझे खिलाया और पिलाया जाता है। अबू सईद खुदरी- रज़िल्लाहु अन्हु- की रिवायत में हैः "तुममें से जो निरंतर रोज़े रखना चाहे, वह सेहरी के समय तक रखे।"
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व्याख्या

अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने अपने साथियों को, उनपर दया तथा कृपा करते हुए, इफ़तार किए बिना निरंतर रोज़े रखने से मना किया है। परन्तु सहाबा पुण्य-प्रेम और अल्लाह की निकटता प्रदान करने वाले कार्यों की चाहत के कारण, नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पदचिह्नों पर चलते हुए, निरंतर रोज़ा रखने की रग़बत रखते थे। यही कारण है कि उन्होंने कहा कि ऐ अल्लाह के रसूल, आप तो लगातार रोज़ा रखते हैं? जिसका उत्तर आपने यह दिया कि अल्लाह आपके अंदर खाने-पीने के नतीजे में पैदा होने वाली शक्ति की तरह ऐसी शक्ति प्रदान कर देता है कि आपको खाने-पीने की आवश्यकता नहीं रहती। हाँ, यदि तुममें से कोई निरंतर रोज़ा रखना ही चाहे, तो फ़ज्र से पहले तक रखे। शरीयत-ए-इस्लामी एक उदार एवं आसान शरीयत है। इसमें न कठिनाई है न मशक़्क़त, न अतिशयोक्ति है न अतिवाद। क्योंकि यह एक तरह से नफ़्स को यंत्रणा देना और उसपर अत्याचार करना है, जबकि अल्लाह किसी पर उसकी शक्ति से अधिक बोझ नहीं डालता। इसका एक और कारण भी है। जहाँ आसानी होगी, वहाँ अमल अधिक समय तक जारी रह सकेगा और उकताहट के कारण अमल से पीछे हट जाने का डर भी कम रहेगा। साथ ही इसमें वह न्याय भी है जो अल्लाह ने धरती में रखा है। यानी अल्लाह को उसका हक़ देते हुए उसकी इबादत करना और नफ़्स को वह चीज़ें देना, जो उसे प्रबल रखने के लिए आवश्यक हों।

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