عن أبي هريرة -رضي الله عنه- قال: لَقَد رَأَيت سبعين من أهل الصُّفَّةِ، مَا مِنهُم رَجُل عَلَيه رِدَاء، إِمَّا إِزَار، وإِمَّا كِسَاء، قد رَبَطوا في أعناقِهم، فمنها ما يبلغُ نصف الساقين، ومنها ما يبلغ الكعبين، فَيَجْمَعُهُ بيده كَرَاهِيَةَ أن تُرى عورَتُه.
[صحيح] - [رواه البخاري]
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अबू हुरैरा- रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैंः मैंने सत्तर सुफ़्फ़ा वालों को देखा। उनमें से किसी के पास चोगा नहीं होता था। या तो लुंगी होती थी या फिर चादर, जिसे वे अपने गले से बाँध लेते थे, जो कभी आधी पिंडलियों तक पहुँचती थी, तो कभी टखनों तक। उसे वे अपने हाथों से पकड़े रहते थे, ताकि उनके गुप्तांग खुलने न पाएँ।
सह़ीह़ - इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।

व्याख्या

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