عن أَبي هريرة وأبي قتادة وَأبي إبراهيم الأشهلي عن أبيه -وأبوه صَحَابيٌّ- -رضي الله عنهم- عن النبيِّ -صلى الله عليه وسلم- أنه صلى على جِنَازَةٍ، فقال: «اللهم اغفر لِحَيِّنَا ومَيِّتِنَا، وصغيرنا وكبيرنا، وذَكرنا وأُنثانا، وشَاهِدِنَا وغَائِبِنَا، اللهم مَنْ أَحْيَيْتَهُ مِنَّا فَأَحْيِهِ على الإسلامِ، ومَنْ تَوَفَّيْتَهُ مِنَّا فَتَوَفِّهِ على الإيمانِ، اللهم لا تَحْرِمْنَا أَجْرَهُ، ولا تَفْتِنَّا بَعْدَهُ».
[صحيح] - [حديث أبي هريرة: رواه ابن ماجه (1/ 480 رقم1498)، وأحمد (14/ 406 رقم8809). وحديث أبي قتادة: رواه أحمد (37/ 248 رقم22554). وحديث الأشهلي: رواه أحمد (29/ 87 رقم17545)]
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अबू हुरैरा, अबू क़तादा और अबू इबराहीम अशहली अपने पिता (जो कि सहाबी थे) से रिवायत करते हैं कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने जनाज़े की नमाज़ पढ़ी और यह दुआ कीः "ऐ अल्लाह, हमारे जीवित तथा मृत, छोटे तथा बड़े, पुरुष तथा स्त्री और उपस्थित तथा अनुपस्थित सबको क्षमा कर दे। ऐ अल्लाह, हममें से जिसे जीवित रखना हो, इसलाम पर जीवित रख और हममें से जिसे मारना हो, उसे ईमान की अवस्था में मौत दे।ऐ अल्लाह, हमें उसके प्रतिफल से वंचित न कर और हमें उसके बाद आज़माइश में न डाल।"
सह़ीह़ - इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है ।

व्याख्या

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