عن الشعبي قال: كان بين رجل من المنافقين ورجل من اليهود خصومة فقال اليهودي: نتحاكم إلى محمد؛ لأنه عرف أنه لا يأخذ الرِشْوَةَ، وقال المنافق: نتحاكم إلى اليهود؛ لعلمه أنهم يأخذون الرِشْوَةَ، فاتفقا أن يأتيا كاهنا في جُهَيْنَةَ فيتحاكما إليه، فنَزلت: {أَلَمْ تَرَ إِلَى الَّذِينَ يَزْعُمُونَ أَنَّهُمْ آمَنُوا بِمَا أُنْزِلَ إِلَيْكَ وَمَا أُنْزِلَ مِنْ قَبْلِكَ يُرِيدُونَ أَنْ يَتَحَاكَمُوا إِلَى الطَّاغُوتِ...}.
[لم أجد له حكماً عند الألباني، وهو مرسل؛ لأن الشعبي تابعي، ولم يدرك القصة.] - [رواه ابن جرير عن الشعبي مرسلا.]
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शाबी कहते हैंः एक मुनाफ़िक़ तथा एक यहूदी के बीच झगड़ा था। यहूदी ने कहा कि हम मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास निर्णय के लिए जाएँगे। क्योंकि उसे पता था कि आप रिश्वत नहीं लेते। जबकि मुनाफ़िक ने कहा कि हम यहूदियों से निर्णय करवाएँगे। क्योंकि उसे पता था कि वे रिश्वत लेते हैं। अंततः, दोनों इस बात पर सहमत हो गए कि जुहैना क़बीले के एक काहिन के पास जाएँगे और उसी से निर्णय करवाएँगे। इसी संदर्भ में यह आयत उतरीः {أَلَمْ تَرَ إِلَى الَّذِينَ يَزْعُمُونَ أَنَّهُمْ آمَنُوا بِمَا أُنْزِلَ إِلَيْكَ وَمَا أُنْزِلَ مِنْ قَبْلِكَ يُرِيدُونَ أَنْ يَتَحَاكَمُوا إِلَى الطَّاغُوتِ...} (ऐ नबी, क्या आपने उन लोगों को नहीं देखा, जिनका दावा है कि वे आपपर तथा आपसे पहले उतरने वाली सारी किताबों पर ईमान रखते हैं, किन्तु चाहते हैं कि अपने विवाद के निर्णय के लिए अल्लाह की शरीयत के सिवा अन्य के पास जाएँ...?)
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व्याख्या

शाबी (उनपर अल्लाह की दया हो) रिवायत करते हैं कि यह आयत {أَلَمْ تَرَ إِلَى الَّذِينَ يَزْعُمُونَ} उस आदमी के कारण उतरी थी, जो ईमान का दावा तो करता था, लेकिन उचित निर्णय से भागने के लिए रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के सिवा किसी और से निर्णय करवाना चाहता था। उसे तनिक भी एहसास नहीं था कि उसका यह कार्य ईमान के विरुद्ध है और इस बात को दर्शाता है कि उसका ईमान का दावा झूठा है। अतः, अब जो भी उसके जैसा कार्य करेगा, वह इस मामले में उसी के जैसा समझा जाएगा।

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